कांटे भरे थे ढेरों, जीवन मेें उसके, उफ्फ ना की , बस चलती रही, तलाशने को, एक नया आस्मां, एक नयी डगर, जहां उसकी ना हो, किसी को खबर। असमत् खुद की, गवां दी थी, दाग जिस्म पर, खा चुकी थी, कोई और नहीं, उसका गुरूर था वो, देवता मान के, पूजा था, जिसको, ठोकर उससे ही खाई, बनी आज मैं, खुद एक पराई। वो खुद नहीं, साथ थे उसके चार, खत्म कर दिया गया, मेरा वजूद, कर दिया मुझको, और मेरे सपनों को, तार-तार, जैसे, कि, किया हो मैनें, प्यार का व्यापार। अश्कों को छुपाए, रोती हूं मैं, तन को समेटे, बैठी हूँ मैं, बेबस हूँ, लाचार हूँ, मन से भी बीमार हूँ, जिस्म को अपने, खुरच रही हूँ, सन्नाटे की ओट, जिस्म पर तो दर्द है, भीतर लगी है चोट। सोच रही हूँ, प्यार का, क्या ये, अन्जाम होता है? कुछ को प्यार नहीं, केवल भूख, मिटाने की हवस, में स्त्री का, ये, क्षणभंगुर, मात्र, शरीर ही क्यों, दिखता है। न्याय का तो पता नहीं, सालों लग जायेगें, तब तक क्या, जियेंगे, या, बेमौत मारे जायेगें, घुट कर जीना, जी कर उठना, कैसे अब कदम,...