कांटे भरे थे ढेरों,
जीवन मेें उसके,
उफ्फ ना की ,
बस चलती रही,
तलाशने को,
एक नया आस्मां,
एक नयी डगर,
जहां उसकी ना हो,
किसी को खबर।
असमत् खुद की,
गवां दी थी,
दाग जिस्म पर,
खा चुकी थी,
कोई और नहीं,
उसका गुरूर था वो,
देवता मान के,
पूजा था, जिसको,
ठोकर उससे ही खाई,
बनी आज मैं,
खुद एक पराई।
वो खुद नहीं,
साथ थे उसके चार,
खत्म कर दिया गया,
मेरा वजूद,
कर दिया मुझको,
और मेरे सपनों को,
तार-तार,
जैसे, कि,
किया हो मैनें,
प्यार का व्यापार।
अश्कों को छुपाए,
रोती हूं मैं,
तन को समेटे,
बैठी हूँ मैं,
बेबस हूँ, लाचार हूँ,
मन से भी बीमार हूँ,
जिस्म को अपने,
खुरच रही हूँ,
सन्नाटे की ओट,
जिस्म पर तो दर्द है,
भीतर लगी है चोट।
सोच रही हूँ,
प्यार का, क्या ये,
अन्जाम होता है?
कुछ को प्यार नहीं,
केवल भूख,
मिटाने की हवस,
में स्त्री का, ये,
क्षणभंगुर, मात्र,
शरीर ही क्यों,
दिखता है।
न्याय का तो पता नहीं,
सालों लग जायेगें,
तब तक क्या,
जियेंगे, या,
बेमौत मारे जायेगें,
घुट कर जीना,
जी कर उठना,
कैसे अब कदम,
आगे बढा पाएगें,
समाज को बर्दाश्त,
तो, होता नहीं,
हमारा प्यार,
फिर कैसे मिलेगा मांझी,
कैसे होगी,
इस जीवन की,
नैया पार।
एक स्त्री प्यार में,
सब कुछ हार जाती है,
जीत कर भी वो,
खुद को झुका जाती है,
कद्र नहीं जिसको,
उस कोख की,
जिसमें जन्म,
उसने लिया,
फिर उसी कोख को,
गाली देता,
कैसा वो शैतान है,
कुछ पल के,
आनंद को समझे,
समझे ना,
उसका मान है,
कैसा तू हैवान है।
औरत हो जाती है
समर्पित पूरी,
जो छुए बस उसका मन,
फिर जबरदस्ती नहीं,
करनी होगी,
दे देगी सब वो,
मन, दिल, तन,
चाहे फिर तुम,
दूर जाओ,
कर लेगी वो,
खुद को अर्पण।
प्यार होता है,
बस एक ही बार,
समा लेती है वो,
उसकी यादें,
दिल के अन्दर,
कहीं गहराई में,
दफना देती है,
खुद से, खुद का प्यार,
जो एकांत पाकर,
बन जाता है,
उसकी कलम का सार।
एक स्त्री को पाना,
तो पूरा पाना,
आधी तो वो,
कभी मिलती नहीं,
कभी भूल कर भी,
अनजाने में भी,
अन्तर्मन को, उसके,
ना चोट, पहुँचाना।
कभी भूल कर भी,
अनजाने में भी,
अन्तर्मन को, उसके,
ना चोट, पहुँचाना।
पढने के लिए धन्यवाद।
@njiBS
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