कि......
एक अधूरी प्यास-सी है, इस दिल में,
कुछ तो था तेरे-मेरे बीच में,
जो आज भी नासूर मेरा, बन दर्द देता है, तुझको,
बार-बार क्यों याद आता है, वो मन्ज़र मुझको।
अकेली ही तो चल रही थी, कुछ भी नहीं था मेरा जीना,
अपने सपनों को लेकर, अठखेलियाँ मैं करती थी,
ना तमन्ना थी, ना आरजू थी कोई, फिर, तूने ही मिला दिया,
मेरे अपने सपनों में एक और नया सपना, अपना।
बढते गये मेरे कदम, एक अंजान दिशा की ओर,
ना उसको पता, ना ही खुद की खबर, ना था कोई छोर,
चल दिए बस दोनों ही, इस सफर पर,अनजान डगर पर,
हाथों में हाथ थामे, बन-एक दूसरे का रहबर।
समय गुज़र गया, सब-कुछ यूं बिछड गया,
सपनो का मेरे वो, ख्वाबी महल जो था, ढल गया,
बिखर गये वादे मेरे,उजड़ चुका बाग सारा,
मुरझाए से फूल सारे, बन गया रेगिस्ता-सा दिल हमारा।
रोया तड़पा वो, मैं भी बिलख पड़ी, नैनों में नीर भर के,
कितनी रातें ना सोई मैं, तू भी तो जागा होगा....,मुझको याद करके,
ठहर-सी गयी ये मेरी जिन्दगी भी,
अब उसकी फरियाद करके।
जा....जा तू अब, मैं ही ना थी तेरे कबिल,
क्या तुझको बतलाऊं मैं।
डाली का इक टूटा फूल थी,
कैसे तुझको समझाऊ मैं...??
प्यार बहुत है आज भी तुझसे,
इन्हीं यादों को तो जीती हूँ।
सजाती हूँ तेरे नाम को हर रचना पर,
आज भी, पहला अक्षर जब, मैं लिखती हूँ।
मेरे हृदय के बागीचे में,
आज भी एक गुलाब खिला था,
अपने अश्कों से जिसको,
तू बन माली सींच गया था।
अपने अश्कों से जिसको,
तू बन माली सींच गया था।
::::शालिनी::::
एक अधूरी प्यास-सी है, इस दिल में,
कुछ तो था तेरे-मेरे बीच में,
जो आज भी नासूर मेरा, बन दर्द देता है, तुझको,
बार-बार क्यों याद आता है, वो मन्ज़र मुझको।
अकेली ही तो चल रही थी, कुछ भी नहीं था मेरा जीना,
अपने सपनों को लेकर, अठखेलियाँ मैं करती थी,
ना तमन्ना थी, ना आरजू थी कोई, फिर, तूने ही मिला दिया,
मेरे अपने सपनों में एक और नया सपना, अपना।
बढते गये मेरे कदम, एक अंजान दिशा की ओर,
ना उसको पता, ना ही खुद की खबर, ना था कोई छोर,
चल दिए बस दोनों ही, इस सफर पर,अनजान डगर पर,
हाथों में हाथ थामे, बन-एक दूसरे का रहबर।
समय गुज़र गया, सब-कुछ यूं बिछड गया,
सपनो का मेरे वो, ख्वाबी महल जो था, ढल गया,
बिखर गये वादे मेरे,उजड़ चुका बाग सारा,
मुरझाए से फूल सारे, बन गया रेगिस्ता-सा दिल हमारा।
रोया तड़पा वो, मैं भी बिलख पड़ी, नैनों में नीर भर के,
कितनी रातें ना सोई मैं, तू भी तो जागा होगा....,मुझको याद करके,
ठहर-सी गयी ये मेरी जिन्दगी भी,
अब उसकी फरियाद करके।
जा....जा तू अब, मैं ही ना थी तेरे कबिल,
क्या तुझको बतलाऊं मैं।
डाली का इक टूटा फूल थी,
कैसे तुझको समझाऊ मैं...??
प्यार बहुत है आज भी तुझसे,
इन्हीं यादों को तो जीती हूँ।
सजाती हूँ तेरे नाम को हर रचना पर,
आज भी, पहला अक्षर जब, मैं लिखती हूँ।
मेरे हृदय के बागीचे में,
आज भी एक गुलाब खिला था,
अपने अश्कों से जिसको,
तू बन माली सींच गया था।
अपने अश्कों से जिसको,
तू बन माली सींच गया था।
::::शालिनी::::
________________in english__________________
That......
,
There is an unfulfilled thirst, in this heart,
There was something between you and me,
Who even today canker mine, becomes pain, gives you,
Why do I remember that scene again and again?
I was walking alone, nothing was my life,
I used to play with my dreams,
There was no desire, nor was there any desire, then, you have mixed it,
Another new dream in my own dreams, mine.
My steps are increasing, towards an unknown direction,
Neither he knew, nor his own news, nor was there any end,
Both of them went on this journey, on the unknown path,
Holding hand in hand, become each other's companion.
Time has passed, everything is lost like this,
The dream palace of mine, which was there, has collapsed,
My shattered promises, the whole garden has been ruined,
All the flowers withered away, our heart has become like a desert.
She cried in agony, I also cried, I was filled with tears,
How many nights I didn't sleep, you must have woken up too..., remembering me,
My life has also come to a standstill,
Now by complaining to him.
Go....go you now, I was not the only one of yours,
Shall I tell you
The branch had a broken flower,
How can I explain to you...??
There is a lot of love for you even today,
I live these memories.
I decorate your name on every creation,
Even today, when I write the first letter.
in the garden of my heart,
Even today a rose was blooming,
Whom by your tears,
You became a gardener.
Whom by your tears,
You became a gardener.
::::Shalini::::
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