दंश
......
"सुनिए....!"
"हां....बोलिए ...!"
"आप, वो बच्ची, दिखाने वाले थे, ना......!" आज ....!
"जी......!"
"परंतु, आप.... कहां से ....??"
मेरा आज अपॉइंटमेंट था। आपके अनाथ आश्रम से मुझे एक बच्ची दिखाने के लिए बुलाया गया था। मैं कोलकता से आई हूँ।
अच्छा.....! अच्छा.....!
"आप......" आराध्या जी....!
"बिल्कुल...."!
थोड़ी देर बाद वह वापस आती है।
अनाथ आश्रम की मैनेजर शायद थी, वो।
मैनें अन्दाजा लगाने की कोशिश की।
"जी, हां ...... !
आप आइए बच्ची देख लीजिए।
मैंने अनाथ आश्रम के बड़े से हॉल में कदम रखा। वहां 10, 15 की तादात में लड़कियां, सुंदर-सुंदर, प्यारी-प्यारी, नए-नए ड्रेस पहन कर खड़ी थी।
उन्हीं में से एक बहुत ही छोटी-सी लड़की थी, जो शायद 6 साल की रही होगी, मैं, उसके पास जाकर खड़ी हो गई !
वह रो रही थी, पता नहीं क्यों...!
मुझे उस पर बहुत प्यार आया। और मैंने प्यार से उसके गाल पर चिकोटी काटते हुए कहा.....
"गुड़िया..... चलोगी, मेरे साथ ....!"
पता नहीं क्यों, वो मेरी साड़ी से लिपट कर खड़ी हो गई, और रोने लगी ...!
"अरे......!" क्या हुआ ....?
अच्छा....! अच्छा.....! ठीक है, मैंने, उसे गोदी में उठा लिया।
अपने पास से एक चॉकलेट निकाल कर खोल कर उसके हाथ में थमा दी।
उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा।
वो भी गोल-मटोल सी टुकुर-टुकुर मुझें ताक रही थी।
मैं मैनेजर की तरफ मुड़ी और कहा,
"यही चाहिए......!"
यह सुनकर मैनेजर अन्दर ऑफिस में चली गई। जरूरी कार्यवाही करने के लिए और लीगल पेपर तैयार करने के लिए।
शाम तक हम उस बच्ची को घर लेकर आ गए।
बहुत सारे खिलौने, कपड़ों से उसके कमरे को भर दिया गया, परंतु, यह क्या.....? वह तो, फिर भी उदास थी!
अपने साथ लाए हुए सामान की पोटली में उसने एक फोटो निकाली, और उस फोटो को देखकर जोर-जोर से रोने लगी।
मैंने उसके हाथ से फोटो ले ली और ध्यान से देखने लगी। वो फोटो एक बुजुर्ग महिला की थी। फोटो के पीछे एक फोन नंबर था।
मैंने, तुरंत ही समय गंवाए, उस फोन नंबर को डायल किया।
"हेलो......!"
"जी.... हां, बोलिए ....!
"यह कहां का नंबर है, और, किसका है ...?
"यह नंबर मालती जी का है....!"
"क्या, मैं इनसे आकर मिल सकती हूँ...."??
"जी.... हां, बिल्कुल...।"
"आ जाइए आप, कल सुबह 10:00 बजे तक"।
मैनें किसी तरह बच्ची को संभाल कर, पूरी रात गुजार दी यही सोचते-सोचते, कि.... "यह मालती जी कौन है.....?" और इनकी फोटो इस बच्ची के बैग में क्यों है...? आखिर, इस बच्ची का मालती से क्या नाता है ....??
अगले दिन सुबह, मैं जल्दी से तैयार होकर उस एड्रेस पर पहुंची।
"मालती वृद्धाश्रम" नाम देखकर मैं चौक गई।
गेट को खोल कर अंदर गई वहां पर पूछताछ की। और, थोड़ी-सी देर में, मालती जी, मेरे सम्मुख खड़ी थीं।
"आप, मालती जी, हैं....??
"जी.... हां ...!"
कृषकाय देह की मालकिन, गोरा-सा रंग, लंबी नाक, आंखों पर चश्मा, सफेद चमकीले लम्बे बाल, उनकी देह कुछ कमजोर-सी लग रही थी। शायद वह बीमार भी थी। वही मालती जी थी।
पूछताछ करने पर पता चला कि उनके बहू और बेटे एक्सीडेंट में मारे गए थे। खाली वो खुद और उनकी पोती बची थी। वह भी लापता है। मालती जी को किसी ने वृद्धाश्रम, जो कि, वही संचालित किया करती थीं, पहुंचा दिया था।
यह सुनकर मुझे एक और झटका लगा और मैंने तुरंत ही बातचीत करके मालती जी को अपने साथ घर ले जाने का फैसला कर लिया।
बिना कुछ सोचे-समझे, मैंने उनका हाथ पकड़ा, उनके नैन भीग चुके थे, और मालती जी रोती-सी उसके उन हाथों को देख रही थी, अपनत्व से। और मैं......धीरे-धीरे प्रसन्न मुद्रा में अपने घर की तरफ चल पड़ी। आज, मैं बहुत खुश थी, कि...... "मैंने आज एक नहीं दो बच्चों को गोद लिया है।" मेरा घर खुशहाली से भरा-पूरा हो जाएगा।
जानती थी, कि एक अनाथ, बिन मां बाप की बेटी होने का दंश......! और कोख सूनी होने का भी....!
आंखों में बेसाख्ता अश्कों की झड़ी-सी लग चुकी थी। कुछ खुशी और कुछ गम के मिश्रित अश्क.....!!
धन्यवाद। ।
......
"सुनिए....!"
"हां....बोलिए ...!"
"आप, वो बच्ची, दिखाने वाले थे, ना......!" आज ....!
"जी......!"
"परंतु, आप.... कहां से ....??"
मेरा आज अपॉइंटमेंट था। आपके अनाथ आश्रम से मुझे एक बच्ची दिखाने के लिए बुलाया गया था। मैं कोलकता से आई हूँ।
अच्छा.....! अच्छा.....!
"आप......" आराध्या जी....!
"बिल्कुल...."!
थोड़ी देर बाद वह वापस आती है।
अनाथ आश्रम की मैनेजर शायद थी, वो।
मैनें अन्दाजा लगाने की कोशिश की।
"जी, हां ...... !
आप आइए बच्ची देख लीजिए।
मैंने अनाथ आश्रम के बड़े से हॉल में कदम रखा। वहां 10, 15 की तादात में लड़कियां, सुंदर-सुंदर, प्यारी-प्यारी, नए-नए ड्रेस पहन कर खड़ी थी।
उन्हीं में से एक बहुत ही छोटी-सी लड़की थी, जो शायद 6 साल की रही होगी, मैं, उसके पास जाकर खड़ी हो गई !
वह रो रही थी, पता नहीं क्यों...!
मुझे उस पर बहुत प्यार आया। और मैंने प्यार से उसके गाल पर चिकोटी काटते हुए कहा.....
"गुड़िया..... चलोगी, मेरे साथ ....!"
पता नहीं क्यों, वो मेरी साड़ी से लिपट कर खड़ी हो गई, और रोने लगी ...!
"अरे......!" क्या हुआ ....?
अच्छा....! अच्छा.....! ठीक है, मैंने, उसे गोदी में उठा लिया।
अपने पास से एक चॉकलेट निकाल कर खोल कर उसके हाथ में थमा दी।
उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा।
वो भी गोल-मटोल सी टुकुर-टुकुर मुझें ताक रही थी।
मैं मैनेजर की तरफ मुड़ी और कहा,
"यही चाहिए......!"
यह सुनकर मैनेजर अन्दर ऑफिस में चली गई। जरूरी कार्यवाही करने के लिए और लीगल पेपर तैयार करने के लिए।
शाम तक हम उस बच्ची को घर लेकर आ गए।
बहुत सारे खिलौने, कपड़ों से उसके कमरे को भर दिया गया, परंतु, यह क्या.....? वह तो, फिर भी उदास थी!
अपने साथ लाए हुए सामान की पोटली में उसने एक फोटो निकाली, और उस फोटो को देखकर जोर-जोर से रोने लगी।
मैंने उसके हाथ से फोटो ले ली और ध्यान से देखने लगी। वो फोटो एक बुजुर्ग महिला की थी। फोटो के पीछे एक फोन नंबर था।
मैंने, तुरंत ही समय गंवाए, उस फोन नंबर को डायल किया।
"हेलो......!"
"जी.... हां, बोलिए ....!
"यह कहां का नंबर है, और, किसका है ...?
"यह नंबर मालती जी का है....!"
"क्या, मैं इनसे आकर मिल सकती हूँ...."??
"जी.... हां, बिल्कुल...।"
"आ जाइए आप, कल सुबह 10:00 बजे तक"।
मैनें किसी तरह बच्ची को संभाल कर, पूरी रात गुजार दी यही सोचते-सोचते, कि.... "यह मालती जी कौन है.....?" और इनकी फोटो इस बच्ची के बैग में क्यों है...? आखिर, इस बच्ची का मालती से क्या नाता है ....??
अगले दिन सुबह, मैं जल्दी से तैयार होकर उस एड्रेस पर पहुंची।
"मालती वृद्धाश्रम" नाम देखकर मैं चौक गई।
गेट को खोल कर अंदर गई वहां पर पूछताछ की। और, थोड़ी-सी देर में, मालती जी, मेरे सम्मुख खड़ी थीं।
"आप, मालती जी, हैं....??
"जी.... हां ...!"
कृषकाय देह की मालकिन, गोरा-सा रंग, लंबी नाक, आंखों पर चश्मा, सफेद चमकीले लम्बे बाल, उनकी देह कुछ कमजोर-सी लग रही थी। शायद वह बीमार भी थी। वही मालती जी थी।
पूछताछ करने पर पता चला कि उनके बहू और बेटे एक्सीडेंट में मारे गए थे। खाली वो खुद और उनकी पोती बची थी। वह भी लापता है। मालती जी को किसी ने वृद्धाश्रम, जो कि, वही संचालित किया करती थीं, पहुंचा दिया था।
यह सुनकर मुझे एक और झटका लगा और मैंने तुरंत ही बातचीत करके मालती जी को अपने साथ घर ले जाने का फैसला कर लिया।
बिना कुछ सोचे-समझे, मैंने उनका हाथ पकड़ा, उनके नैन भीग चुके थे, और मालती जी रोती-सी उसके उन हाथों को देख रही थी, अपनत्व से। और मैं......धीरे-धीरे प्रसन्न मुद्रा में अपने घर की तरफ चल पड़ी। आज, मैं बहुत खुश थी, कि...... "मैंने आज एक नहीं दो बच्चों को गोद लिया है।" मेरा घर खुशहाली से भरा-पूरा हो जाएगा।
जानती थी, कि एक अनाथ, बिन मां बाप की बेटी होने का दंश......! और कोख सूनी होने का भी....!
आंखों में बेसाख्ता अश्कों की झड़ी-सी लग चुकी थी। कुछ खुशी और कुछ गम के मिश्रित अश्क.....!!
धन्यवाद। ।
........in english.......
Dansh...bite
"Listen....!"
"Yes...say..."
"You, that girl, were about to show, weren't you...!" Today ....!
"Yes......!"
"But you... from where...??"
I had an appointment today. I was called from your orphanage to show me a girl child. I have come from Kolkata.
Good.....! Good.....!
"You......" Aaradhya ji....!
"Absolutely...."!
After a while she comes back.
She was probably the manager of the orphanage.
I tried to guess.
"Yes ...... !
Come let's see the girl.
I entered the large hall of the orphanage. There, in the number of 10, 15 girls, beautiful and beautiful, lovely and cute, were standing wearing new clothes.
One of them was a very small girl, who must have been 6 years old, I went and stood beside her!
She was crying, don't know why...!
I fell in love with him. And I lovingly twitched his cheek and said.....
"Doll..... will you come with me...!"
I don't know why, she stood wrapped in my sari, and started crying...!
"Oho......!" What happened ....?
Good....! Good.....! All right, I picked him up on my lap.
He took out a chocolate from him and opened it and handed it to his hand.
He laid his hand on her head lovingly.
She was also staring at me in chubby bits and pieces.
I turned to the manager and said,
"That's what...!"
Hearing this, the manager went inside the office. To take necessary action and prepare the legal paper.
By evening we brought that girl home.
His room was filled with many toys, clothes, but, what is this.....? She was sad though!
She took out a photo in the bag of things she had brought with her, and seeing that photo, started crying loudly.
I took the photo from his hand and started looking carefully. That photo was of an elderly woman. There was a phone number on the back of the photo.
I, wasting my time, dialed that phone number.
"Hi......!"
"Yes... yes, say ....!
"Where's this number, and, whose is it...?
"This number belongs to Malti ji...!"
"Can I come and meet them..."??
"Yes.... Yes, of course..."
"Come on you, tomorrow morning by 10:00".
I somehow managed the girl, spent the whole night thinking, "Who is this Malti ji.....?" And why is her photo in this girl's bag...? After all, what is the relation of this girl with Malti....??
The next morning, I quickly got ready and reached that address.
I was shocked to see the name "Malti Old Age Home".
Opened the gate and went inside and inquired there. And, after a while, Maltiji was standing in front of me.
"You, Malti, are you...??
"Yes ...!"
The mistress of the farmer's body, fair complexion, long nose, spectacles on the eyes, long white shiny hair, her body looked a bit weak. Maybe she was sick too. That was Malti.
On enquiry, it was found that his daughter-in-law and son were killed in the accident. She herself and her granddaughter were left empty. He too is missing. Malti ji was taken by someone to the old age home, which she used to run.
Hearing this, I got another shock and I immediately decided to talk and take Malti ji home with me.
Without hesitation, I held his hand, his nails were wet, and Malti ji was looking at his hands, with affection. And I... slowly walking towards my house in a happy mood. Today, I was very happy that... "I have adopted not one but two children today." My house will be full of happiness.
Knew that the sting of being an orphan, a daughter of no parents......! And also to be pregnant....!
There was a flurry of tears in his eyes. Mixed tears of some happiness and some sorrow.....!!
Thank you. ,
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